रविवार, 3 फ़रवरी 2008


सभी लोगों की अपनी-अपनी सोच होती है। कुछ लोग अपनी सोच को कागज़ पर उड़ेल देते हैं और किताब के रूप मे संग्रहित भी कर लेते हैं जो कि सदियों तक इंसानों की बुद्दि पर राज करती है। कुछ लोग अन्य माध्यमों से अपने विचार बड़े अच्छे ढंग से दूसरों तक प्रेषित करने मे सक्षम होते हैं। और विशेष तौर पर मेरे देश के लोग भेड़-बकरियों की भांति इनके पीछे चल देते हैं। क्या कभी हमने गौर फ़रमाया कि इतने अच्छे विचारों वाले यें लोग खुद उन बातों पर कितना अमल करते हैं?
पिछले दिनों मेरे एक दोस्त के दोस्त ने पूछा कि आप किस दार्शनिक की सोच से प्रभावित हैं ; तो मै चकरा गया, क्योंकि मै तो गांव के एक आंखों से अंधे बुजुर्ग की सोचनी से प्रभावित था, कॉलेज टाईम के एक प्रोफेसर से, अपने बारबर से, अपने दोस्त डॉo मुनीश से, गांधी जी से बेहद प्रभावित हूं और अटल जी भी प्रभावित करते हैं। जबकि विलिअम वोर्ड्सवोर्थ और रजनीश ओशो से मै इत्तफाक नही करता। वो रजनीश जो दूसरों को बन्धन मुक्त रहने की सलाह देते हैं और खुद बौद्ध से बंधे हैं तथा दुसरे लोगों को अपने साथ बाँधने की कोशिश करते हैं।
मै सबसे ज्यादा प्रभावित हूं, अकबर खान से यानि अपने आप से, जिस सोच के तहत रहकर मै अपनी ज़िम्मेदारियाँ बड़ी आसानी से निभा सकता हूं। मै सोचता हूं कि बड़ी-बड़ी बातें बनाने या सुनने की बजाय हमे अपने मन की बात ईमानदारी से सुननी चाहिए, उस पर अमल करना चाहिए। हम स्वयं के सर्वोत्तम दोस्त हों और लाइफ को प्रक्टिकली जीयें तभी हम अपना और अपने राष्ट्र का सही मायनों मे विकास कर पाएंगे। क्या आप मेरी सोच से सहमत हैं? अगर हैं तो अच्छी बात है और अगर नहीं, तो भी अच्छी बात; अपने मन की अच्छी बात सुनिए और अमल कीजिए। शुभ कामनाएं !!!

2 टिप्पणियाँ:

vipin-choudhary ने कहा…

बिलकुल सही अकबर जी, अपनी आत्मा जो कहती है वह ही सही है। यदि हम अपनी आत्मा की आवाज सुनने में
सक्षम है तो हमें अपने निणय पर कभी पछतावा नहीं होगा। हम अपने मालिक खुद हैं।

Akbar Khan ने कहा…

विपिन जी, बहुत धन्यवाद! आपकी टिप्पणियाँ मेरे ब्लोग की खुराक हैं।