मंगलवार, 8 अप्रैल 2008

आज का युवा वर्ग यौन सम्बन्धी विभिन्न भ्रांतियों से ग्रसित है। ऐसे मे वह फंस जाता है, नीम-हकीमों के मकड़जाल मे। जहाँ वह धन के साथ अपने स्वास्थ्य को भी ख़राब करता है।

संतोषप्रद यौन क्रिया की अवधि को लेकर भी विशेषतौर पर भारतीय युवा काफी भ्रमित है। प्रस्तुत है, इसी विषय पर वाशिंगटन से आईएनएस की रिपोर्ट जो कि एक हिन्दी साईट पर छपी है।
अमेरिकी और कनाडाई यौन विशेषज्ञों द्वारा सेक्स सम्बन्धी एक नए सर्वेक्षण के नतीजों के मुताबिक 'श्रेष्ठतम यौन क्रिया' कुछ ही मिनटों की होती है। सर्वेक्षण मे साफतौर पर कहा गया है कि 'लम्बी यौन क्रिया' का दावा करने वाले संभवतः झूठ कहते हैं। पेन्न स्टेट विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं एरिककोर्टी एवम् जिने गार्डियानी ने सोसायटी फॉर सेक्स थेरेपी एंड रिसर्च के सदस्यों के समूह से बात करने के बाद अपने नतीजे घोषित किए। समूह के सदस्यों मे अनेक मनोविश्लेषक, डॉक्टर, समाजसेवी, विवाह एवम् परिवार सलाहकार और नर्सें शामिल हैं। जिन्होंने कईं दशकों के अनुभव के आधार पर अपने विचार दिए। शोधकर्ताओं के अनुसार 'संतोषप्रद यौन क्रिया' का काल तीन से १३ मिनट के बीच का ही होता है। समूह के ६८ प्रतिशत सदस्यों ने यौनक्रिया की शुरुआत से अंत की भिन्न समयावधियाँ निर्धारित की।उन्होंने सात मिनट की अवधि को 'पर्याप्त', १३ मिनट को 'संतोषप्रद', एक से दो मिनट को 'काफी कम', और दस से तीस मिनट को 'उबाऊ' कहा।शोधकर्ताओं के अनुसार आधुनिक समाज मे यौन क्रियाओं सम्बन्धी अनेक भ्रामक धारणाओं ने सिर उठा लिया है। अनेक युवक और युवतियां लम्बी यौन क्रियाओं की फंतासियाँ रचने लगे हैं। इस सर्वेक्षण से सेक्स सम्बन्धी अनेक झूठी धारणाओं को समाप्त करने मे मदद मिलेगी और इससे यौन सम्बन्धी उदासीनता और असमर्थता पर भी रोक लगेगी।सर्वेक्षण के नतीजे जर्नल ऑफ़ सेक्सुअल मेडिसन के आगामी अंक मे प्रकाशित होंगे।
साभार:- http://sify.com/hindi/

रविवार, 3 फ़रवरी 2008

सभी लोगों की अपनी-अपनी सोच होती है। कुछ लोग अपनी सोच को कागज़ पर उड़ेल देते हैं और किताब के रूप मे संग्रहित भी कर लेते हैं जो कि सदियों तक इंसानों की बुद्दि पर राज करती है। कुछ लोग अन्य माध्यमों से अपने विचार बड़े अच्छे ढंग से दूसरों तक प्रेषित करने मे सक्षम होते हैं। और विशेष तौर पर मेरे देश के लोग भेड़-बकरियों की भांति इनके पीछे चल देते हैं। क्या कभी हमने गौर फ़रमाया कि इतने अच्छे विचारों वाले यें लोग खुद उन बातों पर कितना अमल करते हैं?
पिछले दिनों मेरे एक दोस्त के दोस्त ने पूछा कि आप किस दार्शनिक की सोच से प्रभावित हैं ; तो मै चकरा गया, क्योंकि मै तो गांव के एक आंखों से अंधे बुजुर्ग की सोचनी से प्रभावित था, कॉलेज टाईम के एक प्रोफेसर से, अपने बारबर से, अपने दोस्त डॉo मुनीश से, गांधी जी से बेहद प्रभावित हूं और अटल जी भी प्रभावित करते हैं। जबकि विलिअम वोर्ड्सवोर्थ और रजनीश ओशो से मै इत्तफाक नही करता। वो रजनीश जो दूसरों को बन्धन मुक्त रहने की सलाह देते हैं और खुद बौद्ध से बंधे हैं तथा दुसरे लोगों को अपने साथ बाँधने की कोशिश करते हैं।
मै सबसे ज्यादा प्रभावित हूं, अकबर खान से यानि अपने आप से, जिस सोच के तहत रहकर मै अपनी ज़िम्मेदारियाँ बड़ी आसानी से निभा सकता हूं। मै सोचता हूं कि बड़ी-बड़ी बातें बनाने या सुनने की बजाय हमे अपने मन की बात ईमानदारी से सुननी चाहिए, उस पर अमल करना चाहिए। हम स्वयं के सर्वोत्तम दोस्त हों और लाइफ को प्रक्टिकली जीयें तभी हम अपना और अपने राष्ट्र का सही मायनों मे विकास कर पाएंगे। क्या आप मेरी सोच से सहमत हैं? अगर हैं तो अच्छी बात है और अगर नहीं, तो भी अच्छी बात; अपने मन की अच्छी बात सुनिए और अमल कीजिए। शुभ कामनाएं !!!

गुरुवार, 31 जनवरी 2008

"हम किधर जा रहे हैं" के शीर्षक से सफीदों मे हुई विचार-गोष्ठी मे दिल्ली से आये युवा विचारक अली मोहम्मद फलाही ने अपने विचार यूं प्रकट किये:-

जो धर्म मानवता का सम्मान न कर सके वो धर्म नही, बल्कि एक ढकोसला मात्र है, जो कि लोगो को वरग्लाता है।

उन्होने शायराना अंदाज़ मे कहा कि:-
नही ब्रहामन, नही अछूत
मानव-मानव एक समान
सब हैं, आदम की संतान
काठमांडू। हिमालय की दंतकथाओं में वर्णित हिममानव (येती) के अस्तित्व की खोज में लगे एक अमेरिकी टेलीविजन चैनल ने नेपाल के माउंट एवरेस्ट इलाके में इसके पदचिन्ह खोज निकालने का दावा किया है।टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम “.डेस्टीनेशन ट्रुथ” के इंफ्रारेड केमरों से लैस नौ निर्माताओं ने हिमालय के खुंबू इलाके में स्थित माउंट एवरेस्ट पर मंजू नदी के किनारे 2,850 मीटर की उंचाई पर येती के पदचिन्ह खोज निकालने का दावा किया है। टीवी कंपनी की ओर से कहा गया है कि कुल तीन पद चिन्ह मिले हैं और इनमें एक पदचिन्ह बुधवार को मिला।माउंट एवरेस्ट पर एक सप्ताह बिताने के बाद लौटने पर खोजकर्ताओं ने कल काठमांडू में यह जानकारी दी। कार्यक्रम के प्रस्तोता जोश होस्ट ने बताया कि पद चिन्हों का आकार एक फुट का है और आकार में ये लगभग एकसमान हैं।श्री होस्ट ने बताया –“मैं विश्वास नहीं कर सकता कि यह किसी भालू के पैरों के निशान हैं यह हमारे लिये अबूझ पहेली की तरह है।” गौरतलब है कि दंतकथाओं में हिमालय के माउंट एवरेस्ट इलाके में हिममानव के मिलने की चर्चायें प्रचलित हैं। इसके अलावा 1920 के बाद माउंट एवरेस्ट पर जाने वाले पर्वतारोहियों द्वारा भी इस तरह के प्रमाण मिलने की बातें कही जाती रही हैं।

शुक्रवार, 25 जनवरी 2008

नई दिल्ली 24 जनवरी: देश में मोबाइल पर टेलीविजन देखने की लोगों की इच्छा जल्दी ही पूरी होने वाली है. भारतीय दूर संचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने मोबाइल टेलीविजन सेवा से संबंधित मुद्दों पर आज सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को अपनी सिफारिशें सौंप दी.ट्राई ने कहा है कि जिन दूर संचार आपरेटरों के पास सीएमटीएस या यू.ए.एस.एल लाइसेंस हैं उन्हें पहले से आवंटित स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करते हुये अपने नेटवर्क पर मोबाइल टेलीविजन सेवा देने के लिये नये लाइसेंस या अनुमति की जरुरत नहीं होनी चाहिये. प्रसारण प्रणाली से मोबाइल टेलीविजन सेवा देने के लिये अलग लाइसेंस की जरुरत होगी. दूर संचार नियामक ने कहा है कि प्रसारण प्रौद्योगिकी अपनाने का विकल्प आपरेटर पर छोड देना चाहिये. आपरेटर यदि हैंडसेट उपलब्ध कराता है तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि उपभोक्ता उसी प्रौद्योगिकी वाले दूसरे आपरेटर की सेवा लेना चाहे तो वह हैंडसेट बदले बिना ऐसा कर सके.उसने कहा है कि ऐसे लाइसेंस देने के लिये बोलियां आमंति्रत की जानी चाहिये. उसने इस सेवा के लिये 74 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति देने की सिफारिश की है. इस सेवा के लिये स्पेक्ट्रम आवंटन के बारे में ट्राई ने कहा है कि दूरदर्शन के अलावा प्रत्येक प्राइवेट मोबाइल टीवी आपरेटर को इस सेवा के लिये आठ मेगाहर्टज का कम से कम एक स्लाट 585 मेगाहट्र्ज से 806 मेगाहर्ट्ज तक यू एचएफ बैंड वी में दिया जा सकता है.Source: Oneindia

शनिवार, 22 दिसंबर 2007

भारत के उत्तरी राज्य बिहार में ग्रामीण महिलाओं का एक सामुदायिक समाचार कार्यक्रम इन दिनों ख़ूब धूम मचा रहा है जो पखवाड़े में एक बार टेलीविज़न पर दिखाया जाता है.
अप्पन समाचार (हमारा समाचार) नामक इस समाचार कार्यक्रम को इसी महीने यानी दिसंबर 2007 के शुरू में पहली बार टेलीविज़न पर दिखाया गया था और तभी से ये मुजफ्फरपुर ज़िले के एक दर्जन से अधिक गाँवों में काफ़ी लोकप्रिय हो गया है.
इसे कभी प्रोजेक्टर पर और कभी किराए के वीडियो प्लेयर और एक बड़े टेलीविजन सेट पर दर्शकों के सामने पेश किया जाता है.
निर्माण
कार्यक्रम का निर्माण गंडक नदी के किनारे स्थित रामलीला गाची गाँव के एक अंधेरे से कमरे में किया जाता है जिसमे एक मेज़, दो कुर्सियां, एक पुराना टेलीविजन मौजूद है और फ़र्श पर तारों का जाल बिछा है.
गाँव में पिछले चार साल से बिजली नहीं है और यहाँ अभी तक केबल टेलीविजन और लैंडलाइन फोन नहीं पहुँचे हैं. रामलीला गाची में मोबाइल फ़ोन आए हुए भी केवल एक वर्ष ही हुआ है.
गाँव से सबसे निकट का अस्पताल 62 किलोमीटर दूर है और सबसे नज़दीकी पुलिस थाना 20 किलोमीटर की दूरी पर है।
तीन लड़कियाँ और एक नवविवाहिता समाचार एकत्र करने के लिए साइकिल पर निकलती हैं और इनके पास एक सस्ता हैंडीकैम यानी वीडियो कैमरा, एक ट्रायपॉड और एक माइक्रोफ़ोन रहता है.
टीम
ख़ुशबू कुमारी केवल 15 वर्ष की हैं लेकिन 45 मिनट के समाचार वो एक सधे हुए एंकर की तरह पढ़ती हैं.
अनीता कुमारी उम्र में कुछ बड़ी हैं लेकिन अपने मोहक व्यक्तित्व की वजह से इलाक़े में काफी मशहूर हैं.
अनीता कहती हैं, “मैं पानी, बिजली, किसानों की परेशानियों और महिलाओं के विषयों पर समाचार एकत्र करती हूं और फिर उन समाचारों को गाँव के बाज़ार में दिखाया जाता है जिससे प्रत्येक व्यक्ति इन्हें देखकर इनके बारे में सोच सके.
इसी तरह कैमरा संभालने वाली रूबी कुमारी और नवविवाहित स्क्रिप्ट लेखिका रूमा देवी भी अपनी जिम्मेदारी बख़ूबी निभाती हैं.
इन दोनों ने बताया कि वे प्रतिदिन ऐसे विषय खोजती हैं जो ग्रामीणों को प्रभावित करते हैं और फिर इन पर प्रत्येक कोण को ध्यान में रखकर काम किया जाता है और फिर इन्हें प्रदर्शित किया जाता है.
इस अनोखे कार्यक्रम की योजना एक सामाजिक कार्यकर्ता संतोष सारंग की देन है.
इस कार्यक्रम के पहले संस्करण में महिलाओं के सशक्तिकरण, निर्धनता और कृषि की समस्याओं से संबंधित समाचार दिखाए गए थे.
गाँव में बिजली नहीं होने की वजह से 'अप्पन समाचार' ने प्रोजेक्टर और अन्य उपकरणों को बिजली की आपूर्ति के लिए जेनरेटर किराए पर लिया है.
संतोष सारंग ने बताया कि जल्द ही इस कार्यक्रम को प्रत्येक सप्ताह दिखाया जाएगा.
गाँव के लोग इस बात से काफी खुश हैं कि उनकी समस्याओं को टेलीविजन पर दिखाया जा रहा है और इलाके के सभी लोग उनकी आवाज़ सुन रहे हैं.
उन्हें उम्मीद है कि उनकी आवाज़ सरकारी लोगों के कानों तक भी पहुँचेगी। Courtesy: bbc hindi